लेखक: मौलाना यक़ीन अब्बास कलकत्तवी
हौज़ा न्यूज़ एजेंसी !
अय्याम-ए-अज़ा इख़्तिताम को पहुँच गए, मजलिसों की सदाएँ थम गईं, मातम की आवाज़ें ख़ामोश हो गईं और अज़ादारी के इज्तिमाआत अपने इख़्तिताम को पहुँच गए, मगर कर्बला का पैग़ाम ख़त्म नहीं हुआ। वह आज भी हमारे दिलों, हमारे किरदार और हमारे इज्तिमाई ज़मीर को पुकार रहा है।
कर्बला हमें सिर्फ़ आँसू बहाना नहीं, ज़मीर जगाना सिखाती है; सिर्फ़ मातम करना नहीं, मक़सद-ए-हुसैन को समझना सिखाती है; सिर्फ़ हुसैन (अ)से मोहब्बत का दावा नहीं, बल्कि हुसैन(अ) के रास्ते पर चलने का अहद सिखाती है। आशूरा गुज़र गया, अय्याम-ए-अज़ा गुज़र गए, मगर कर्बला का सवाल आज भी हमारे सामने ज़िंदा है:
हमने कर्बला से क्या लिया?
क्या हमारे आँसुओं ने हमारे किरदार में कोई तब्दीली पैदा की? क्या हमारी मजलिसों ने हमारी फ़िक्र को बेदार किया? क्या हमारी अज़ादारी ने हमें ज़ुल्म, नाइंसाफ़ी, झूठ, इस्तिहसाल और बातिल के ख़िलाफ़ खड़े होने का हौसला दिया? क्या मोहब्बत-ए-हुसैन(अ) ने हमारे अंदर हक़, अद्ल, सदाक़त, अमानत और ख़िदमत-ए-ख़ल्क़ की रूह पैदा की?
अगर ऐसा नहीं हुआ तो हमें अपने आप से यह सवाल ज़रूर करना चाहिए कि हमने कर्बला को सिर्फ़ सुना है या समझा भी है?
कर्बला किसी एक तारीख़, एक मक़ाम या एक वाक़िए का नाम नहीं; यह हक़ और बातिल के दरमियान एक दायमी मैदाने-कारज़ार का उनवान है। इमाम हुसैन(अ) ने अपने ख़ून से यह हक़ीक़त साबित कर दी कि हक़ की राह में तादाद नहीं, किरदार अहम होता है; ज़ाहिरी कामयाबी नहीं, बल्कि उसूलों पर इस्तिक़ामत अस्ल कामयाबी है। इसी लिए कर्बला हर दौर के इंसान को दावत देती है कि वह अपने ज़माने के ज़ुल्म को पहचाने, हक़ का साथ दे और अपने किरदार से हुसैन के पैग़ाम को ज़िंदा रखे।
इसलिए अय्याम-ए-अज़ा के इख़्तिताम का मतलब यह नहीं कि हमारा ताल्लुक़ कर्बला से भी ख़त्म हो गया।
अस्ल अज़ादारी तो उस वक़्त शुरू होती है जब मजलिस से उठने के बाद कर्बला हमारे किरदार में उतर आए, जब नौहा हमारी ज़बान से निकलकर हमारे अमल में ज़ाहिर हो, जब मातम हमारे दिल को बेदार करके हमें मज़लूम का सहारा बनने पर आमादा करे और जब हुसैनؑ से मोहब्बत हमें हक़ के रास्ते पर साबित-क़दम रहने का हौसला अता करे।
कर्बला हमसे सिर्फ़ यह नहीं पूछती कि तुम हुसैन(अ) के लिए कितना रोए?
बल्कि यह भी पूछती है कि तुम हुसैन(अ) के पैग़ाम के लिए कितना जिए?
यही वह सवाल है जिस पर हमें अय्याम-ए-अज़ा के बाद रुककर ग़ौर करना होगा, क्योंकि आशूरा ख़त्म हो सकता है, मगर आशूराई शऊर कभी ख़त्म नहीं होना चाहिए। कर्बला का चिराग़ मजलिसों के इख़्तिताम के साथ बुझना नहीं चाहिए; उसे हमारे घरों, हमारे समाज, हमारी नस्ल-ए-नौ और हमारे किरदार में रोशन रहना चाहिए।
अल्लाह तआला आपकी और हम सबकी अज़ादारी, मातमदारी और पुरसा-दारी को अपनी बारगाह-ए-आलिया में शरफ़-ए-क़ुबूलियत अता फ़रमाए। हमें शोहदा-ए-कर्बला, बिलख़ुसूस हज़रत इमाम हुसैन (अ.) के अज़ीम मिशन और पैग़ाम को समझने, उसे अपनी ज़िंदगियों में अपनाने और हक़ व सदाक़त की राह पर साबित-क़दम रहने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए।
परवरदिगार-ए-आलम! हमारे दिलों में मोहब्बत-ए-हुसैन (अ.) को हमेशा ज़िंदा और ताबनाक रख, हमें ज़ुल्म और बातिल के मुक़ाबले में हक़ का साथ देने, मज़लूमों की हिमायत करने और ख़िदमत-ए-ख़ल्क़ को अपनी ज़िंदगी का शिआर बनाने की तौफ़ीक़ अता फ़रमा।
अल्लाह तआला हमें अज़ादारी-ए-हुसैन (अ.) की रूह, कर्बला के शऊर और आशूराई किरदार से हमेशा वाबस्ता रखे, हमारी नस्लों के दिलों में मोहब्बत-ए-अहले-बैत (अ.) को महफ़ूज़ रखे और अज़ादारी का यह मुक़द्दस सिलसिला हमेशा जारी व सलामत रखे।
ख़ुदाया! हमारे शोहदा-ए-कर्बला की क़ुर्बानियों को हमारे लिए हिदायत, बेदारी और अमल का चराग़ बना दे, और हमें इमाम हुसैन (अ.) के रास्ते पर साबित-क़दम रख।
आमीन या रब्बुल आलमीन!
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